» गणेशजी के नाम एक चिट्ठी


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चिर स्मरणीय गणेशजी,
सादर प्रणाम !

आजादी के बहुत
साल पहले
ही लोकमान्य
तिलकजी ने गणनायक के रूप में
आपको भलीभाँति पहचान लिया था। भारत के
गणतंत्र का नायक कैसा हो, इसकी छवि उन्होंने आप
में देखी थी। तिलक जी और उनके जैसे लोग
यदि आजादी के बाद जीवित रहते तो जरूर भारत
का गणनायक आपके समान ही होता। परंतु हर्ष
की बात है कि नई पीढ़ी ने वह घिसा-पिटा आदर्श
नहीं अपनाया जो पूर्ववर्ती पीढ़ी ने स्थापित
किया था।
तिलकजी चाहते थे कि भारत का गणनायक आपके
समान विघ्न-विनाशक हो। अब यदि विघ्नहीन रहें
तो जीने का क्या मजा ! इसलिए हमारे नये नेताओं ने
रोज नई समस्याएँ पैदा कीं। आजादी के बाद देश ने
इतनी प्रगति की कि आज देश में समस्याओं की दलदल
है। चारों ओर समस्याएँ-ही-समस्याएँ, विघ्न-ही-
विघ्न। नेता प्रसन्न हैं।
पुरानी पीढ़ी की परिकल्पना थी कि देश
का गणनायक विघ्न-विनाशक हो। हमने विघ्न
पैदा करनेवाले गणनायक बनाए। यह प्रगति है।
आप गणदेवता हैं। आपको अपने गणों के दु:खों की,
तकलीफों की बहुत चिंता रहती है। आप खुद
दु:खी रहकर अपने गणों का दु:ख दूर करते हैं। हमने
तसवीरों में, मूर्तियों में साफ-साफ देखा है कि आपके
हाथ में लड्डू हो, न हो, परंतु आपके वाहन चूहे के हाथ
में लड्डू जरूर होता है। चूहा आखिरी प्राणी है।
आपको उसकी चिंता है। समाज के अंतिम
प्राणी को जब तक लड्डू न मिल जाए, आप भोजन
ग्रहण नहीं करते। यह आदर्श है गणदेवता का। हमारे
गणदेवता दूसरी तरह से सोचते हैं। उन्हें पहले
अपनी चिंता है। समाज का आखिरी आदमी भूखा है,
नंगा है और फटेहाल है; परंतु उनके दोनों हाथों में
लड्डू हैं। ज्यादा हुआ तो वे अपने पुत्रों, सालों और
रिश्तेदारों के लिए लड्डू की व्यवस्था जरूर कर देते
हैं। आजादी के बाद देश में लड्डुओं का बँटवारा ऊपर-
ही-ऊपर हो रहा है। आखिरी आदमी ‘चूहा’ दु:खी है,
परेशान है। वह टुकुर-टुकुर आशा भरी निगाहों से
अपने गणेशजी को, जिन्हें वह सदा अपनी पीठ पर
लादे रहता है, देख रहा है। उधर गणेशजी भूखे चूहे
की पीठ पर लदे बड़े मजे से मोतीचूर के तर लड्डू
उड़ाए जा रहे हैं।
गणेशजी, आप बुद्धि और विवेक के धनी हैं। हमारे
गणनायक को भी वैसा ही होना चाहिए था; परंतु वे
इतने व्यस्त रहते हैं कि उन्हें पढ़ने-लिखने का समय
ही नहीं मिलता। यों भी अब देश में राज करने के
लिए बुद्धि और विवेक की जरूरत नहीं रही। अब
जरूरत है तिकड़म की, गुटबाजी और वोट बैंक की।
इसलिए हमारे गणदेवता बुद्धि और विवेक को बलाए
ताक रखकर रात-दिन वोटों की चिंता में लगे रहते
हैं। वोट उनके हैं तो वे गणपति हैं। वोट दूसरे के
हो जाएँगे तो वह गणपति हो जाएगा। बुद्धि और
विवेक का धनी कोई गणेश आज शिखर पर दिखाई
नहीं देता।
गणेशजी, आपकी नाक बहुत लंबी है। हर गणनायक
की होनी चाहिए। नाक बहुत संवेदनशील होती है।
नाक की घ्राण शक्ति से हमें हर खतरे का पूर्वाभास
हो जाता है। नाक हमें तुरंत बता देती है कि आगे
ऐसा है, या वैसा है। इसलिए नाक का परिपुष्ट
होना जरूरी है। नाक मान-सम्मान का प्रतीक है।
नाक है तो सबकुछ है। जिसकी नाक ही कट गई उसके
पास फिर क्या बचा ! इसलिए हमने लंबी नाक वाले
गणेशजी को प्रथम वंदनीय माना। इधर
बिना नाकवाले लोगों की संख्या बढ़ी है। कुछ लोग
सुबह गणेशजी की पूजा करते हैं। खेलों में नाक कटवाने
की परंपरा हमारी पुरानी है। कभी फुटबॉल में
तो कभी हॉकी में हम अपनी नाक कटवाते रहते हैं।
ओलंपिक खेलों से लौटकर तो हमें अपने
चेहरों को टटोलकर देखना होता है कि कहीं नाक
का निशान भी बचा है कि वह भी मिट गया। नाक
कटवाने की दिशा में हमने कीर्तिमान स्थापित
किया है। आजकल नए-नए घोटालों के समाचार आ रहे
हैं। जिन्हें हम लंबी नाकवाला समझते थे पता चला, वे
तो बहुत पहले ही कटा चुके हैं। इधर नकली नाक से
काम चला रहे थे। आजकल लंबी नाकवाले को देखकर यह
भ्रम होता है कि कहीं इसकी नकली तो नहीं है।
गणेशजी, आपको यह लिखते हुए मुझे बेहद दु:ख
हो रहा है कि आपके देश में, जहाँ नाक की महिमा में
चार चाँद लगाए थे वहाँ अब नाक
की प्रतिष्ठा बिलकुल कम हो गई है। हमारे
गणनायक अब बिना नाक के सुखपूर्वक जी रहे हैं।
गणेशजी, आपके कान बड़े हैं। दूर किसी भी कोने में
कोई दु:खी रोता है, कराहता है या चीखता है
तो आपके कान उसकी आवाज तुरंत सुन लेते हैं। आपके
कान सजग हैं, संवेदनशील हैं; दु:खी और पीड़ित जन
की पुकार वे तत्काल सुनते हैं। गणनायक के कान
यदि बड़े न हों तो वह अपने देश के करोड़ों दलितों,
पीड़ितों और दुखियों की पुकार कैसे सुन पाएगा।
आजकल कान में रुई डालने का फैशन है। हमारे गणनायक
अपने कानों में रुई घुसेड़े जनता की समस्याएँ सुनते हैं।
एक बड़े नेता कान में मशीन लगाते हैं। पिछले
दिनों कर्मचारियों का एक डेलीगेशन अपनी समस्याओं
के लिए उनसे मिलने गया। उन्होंने बड़े प्रेम से
बैठाया। चाय भी पिलाई। फिर कान की मशीन
निकालकर टेबल पर रखते हुए बोले, ‘कहिए,
आपकी क्या समस्या है ?’
बड़े कान हों तो उनपर जूँ रेंग सकती है। जूँ को रेंगने
के लिए भी तो कुछ जगह चाहिए। जिनके कान
पिद्दी-से हैं उनपर भला क्या जूँ रेंगेगी ! अधिकांश
लोगों के कान तो यों ही बहुत छोटे हैं, फिर उनमें
वर्षों से मैल जमा हुआ है। वे
अपनी बीवी की समस्याएँ नहीं सुन पाते तो देश
की समस्याएँ क्या सुनेंगे। कुछ लोग, जो अपने कानों में
कड़वा तेल डाले रहते हैं, उलटा सुनते हैं। उनसे
कहो कि फलाँ जगह बाढ़ आ गई है तो वे अपने चहेते
अफसरों को सूखा राहत फंड का इंचार्ज बनाकर
वहाँ भेज देते हैं।
गणेशजी, आप तो अपने कानों से दीन-दुखियों की बातें
सुनते थे। हमारे गणनायक अपनी प्रशंसा, अफवाहें एवं
विरोधियों की आलोचना के सिवा और कुछ
नहीं सुनते।
गणेशजी, आपके जैसा मातृभक्त संसार में और कौन
मिलेगा। माता की आज्ञा पालने के लिए आप अपने
पिता महादेव से भिड़ गए। सिर कटा दिया, परंतु
आपने मातृ आज्ञा का उल्लंघन न होने दिया। आप
जननी के परम सेवक हैं। भारत माता की सेवा के लिए
हमें ऐसे ही जननायक चाहिए। ‘सिर कटा सकते हैं,
लेकिन सिर झुका सकते नहीं।’ परंतु हमारे ही देश में
रक्षा सौदों में घपले उजागर हुए। हमारे
जननायकों ने खुशी-
खुशी मातृभूमि का बँटवारा स्वीकार कर लिया था।
जब सारे देवता ब्रह्मांड की परिक्रमा करने के लिए
दौड़ रहे थे तब आपने माता-
पिता की परिक्रमा करके प्रथम पूज्य होने
का अधिकार पाया। हमारे नेता प्रथम पूज्य
तो होना चाहते हैं, परंतु अपने माँ-बाप का अपमान
करके। पिछले दिनों राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के
लिए कुछ नेताओं की प्रतिकूल
टिप्पणियाँ समाचारपत्रों में छपीं। कुछ ने तो उन्हें
‘राष्ट्रपिता’ कहे जाने पर अपना विरोध व्यक्त
किया। इस प्रकार गणनायक माता-पिता से नहीं,
सिर्फ अपने आपसे प्रेम करते हैं।
आजाद भारत के नव गणतंत्र के लिए
गणदेवता का प्रतीक चुना गया था। ऋद्धि-
सिद्धि अगल-बगल हों; लंबी नाक, लंबे कानवाला,
विद्या और विवेक का धनी हमारा गणनायक हो; वह
मातृभक्ति के प्रति समर्पित हो और चूहे तक के हाथ
में सदा लड्डू रहे, इसके लिए कृतसंकल्प हो।
गणेशजी, मुझे आपको यह लिखते हुए बहुत दु:ख
हो रहा है कि हर वर्ष हम आपकी पूजा-
अर्चना तो बड़ी धूमधाम से करते हैं परंतु आपके आदर्श
बिलकुल नहीं अपनाते। हमारे गणयनाक
आपकी कसौटी पर पूरी तरह खरे नहीं हैं। वे
गणदेवता होकर प्रथम पूज्य तो होना चाहते हैं, इसके
लिए वे एड़ी-चोटी का पसीना भी एक कर डालते हैं;
परंतु खुद लड्डू ढकोसते हुए बेचारे चूहों के पेट की उन्हें
कोई चिंता नहीं है। कान बंद हैं उनके। नाक
का कहीं अता-पता नहीं है। विद्या और विवेक से
कभी उनका वास्ता नहीं रहा। मातृभक्ति के संस्कार
उनमें नहीं हैं। बावजूद उनकी यही चाहत है
कि गणनायक के रूप में उन्हें
सदा प्रतिष्ठा मिलती रहे।
शेष यहाँ सब कुशल-मंगल है। आप वहाँ स्वर्ग में बैठे
सोचते होंगे कि संसार के सबसे बड़े गणतांत्रिक देश ने
अब तक बहुत प्रगति कर ली होगी। तो इस संदर्भ में
मुझे यही कहना है कि हम श्री गणेशाय नम: से चले थे
और गोबर गणेश तक पहुँचे।
-आपका एक भक्त

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