‘ अंकल, ठंड लगती है तो लाश से चिपक जाती हूं’


करीब दो दशक पहले पुरानी दिल्ली की सड़क पर हबीब भाई से मुलाकात हुई। लावारिश लाशें उठाने वाले हबीब और आंखों की रोशनी खो चुकी उनकी पत्नी आमना लोक नारायण अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर रहते थे। लावारिश लाशों को उठानेे वाले इस दंपती की संपत्ति एक ठेला थी। उन्हें लावारिस लाशों को उठाने के बदले 20 रुपए मिलते और लाश को दो मीटर कपड़ा।Anshu Gupta with team.

इनके साथ पूरा हफ्ता गुज़ारा, ना जाने कितनी लाशें देखीं, रोज एक नई मौत के साथ हिंदुस्तान की गरीबी को देखा, हर उम्र, हर शक्ल में। सड़क पर एक लाश देखकर सिहर उठने वाला, अब मैं हफ्ते भर में निडर हो गया था।

हबीब भाई रोज आप बीती से दहलातेे। एक दिन बोले, सर्दियों में मेरा धंधा बढ़ जाता है, कभी-कभी इतना काम होता है कि संभलता नहीं।

मैंने भी देखा रोज 10 से 12 लाशें उठाते। गर्मियों में यह आंकड़ा घटकर 4-5 रह जाता। ठंड नहीं मारती, कपड़ों की कमी मारती है। मुझ पर, हबीब भाई पर कपड़े थे, सो वो लाशें उठाते रहे, और मैं कहानियां लिखता रहा। मरा वो जिसने मजबूरी में पांच रुपए की कच्ची दारू पीकर सोचा होगा कि यह पीला सा तरल पदार्थ कपड़ों सी गर्मी देगा।

मैं सुबह स्कूटर लेकर फुटपाथ पर पहुंच जाता, क्योंकि मौत की खबरें सुबह ज्यादा आती थीं। हबीब की एक बेटी थी, कनीज़ बानो। एक बार सुबह करीब पांच वर्ष की कनीज हमारे पास आकर बोली, ”जब मुझे ठंड लगती है, तो मैं लाश के साथ चिपककर सो जाती हंू। अंकल, लाश तंग नहीं करती, करवट नहीं बदलती।” ‘गूंज’ 16 साल की होने को है, ‘कपड़ा’ आज एक मुद्दा बनने की कगार पर है, कहीं जाते हैं तो लोग कहानी सुनना चाहते हैं, बार-बार, हजारों बार कनीज़ के शब्द दोहरा चुके हैं हम, शरीर में उसी सिहरन के साथ।

लोगों की मदद के लिए कुछ कपड़ों से शुरु की गई संस्था ‘गूंज’ के चंद दिनों में 16 साल हो जाएंगे। आम बोलचाल में जिन्हें पुराना कपड़ा कहते हैं, हम ढूंढ़ते हैं किसी को, जो अब इन कपड़ों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

‘गूंज’ ने सोलह साल के सफर में इस सामान से पुल बनाए, सड़कें बनाईं, गाँव में शराब की भट्टियाँ बंद करवाईं, न जाने कितनी ठंड में कपड़े की कमी से होने वाली मौतें रोकीं। यदि एक तरफ ‘सुजनी’ के रूप में रोज़गार का साधन बना है तो दूसरी ओर ‘माई पैड’ के रूप में महिलाओं से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे को खोलने का हथियार।

देश-विदेश के आका भले ही बेहतरीन सूट में हों, पर कपड़े को मुद्दा मानने को तैयार नहीं हैं। योजना में न बात होती है, न बजट। बुनियादी ज़रूरत कहो, तो कहते हैं रोटी, कपड़ा, मकान। विकास के मुद्दे में कहीं नाम ही नहीं।

हम भी जि़द्दी हैं, इसे मुद्दा तो बनाकर ही छोड़ेंगे। सबसे बड़ी बात, इसको दान के दायरे से निकाल देंगे। ये जो शब्द है- ‘डोनेशन’ (दान), पुराने कपड़े के लिए, इसको निकालना है सभी के ज़ेहन से। क्योंकि मुझे हमेशा लगता है, हम पुराना कपड़ा दान नहीं करते बल्कि हमें तो शुक्रगुज़ार होना चाहिए उनका जो हमारा उतरा हुआ पहनते हैं।

लोग सोचते हैं कि हम पुराना कपड़ा इकट्ठा करने और बांटने वाले लोग हैं, हम यह नहीं करते। आज ‘गूंज’ एक हज़ार टन से ज्यादा सामान, कपड़ों से लेकर पुराना फर्नीचर तक, हर वर्ष नए संसाधन के रूप में इस्तेमाल करता है।

कितना अहम है यह कपड़े का टुकड़ा, किसी के शरीर से उतरने के बाद भी अहमियत कम नहीं होती। हमारी कई साल की सोच है। जहां हज़ारों का हम पर विश्वास है, तो वहीं सैकड़ों का तिरस्कार और अपमान भी। देश का विकास सिर्फ यंू ही हो सकता है, सोच वाले कई दिग्गजों के लिए छोटा सा सीखने का मौका भी और भव्य एयरपोर्ट, जीडीपी, मॉल, मेट्रो से देश की प्रगति आंकने वालों के लिए देश की बड़ी आबादी की हकीकत जानने का एक मौका भी है। तभी कह रहा हूँ, यह कपड़े का टुकड़ा, सिर्फ दान में बांटने वाली चीज़ नहीं है, एक हथियार है।

इस हफ्ते से ‘गाँव कनेक्शन’ में शुरू हो रहीं बदलाव की 100 कहानियों में यह बताने की कोशिश है कि समाज के एक हिस्से का अनुपयोगी सामान देश के लिए कितनी बड़ी ताकत बन सकता है। बशर्ते हम पाने वाले को कुछ इज्जत दें, उसके स्वाभिमान को समझें।

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